Film  Jewel Thief – देवानंद (Devanand) स्टारर फिल्म ज्वैलथीफ आपने देखी होगी और इस फिल्म के फेमस गाने होठों में ऐसी बात मैं दबा के चली आई को अक्सर सुना भी होगा. लेकिन क्या आपको ये पता है कि इस फिल्म की वजह से ही सिक्किम को उसकी पहली हिंदी फिल्म रोमियो इन सिक्कम (Romeo in Skikkim) मिली थी. इस फिल्म की शूटिंग से ही इंस्पायर होकर सिक्किम के एक नागरिक ने सिक्किम की पहली हिंदी फिल्म रोमियो इन सिक्किम बनाई थी. 1967 में रिलीज़ हुई देवानंद, अशोक कुमार, वैजयन्ती माला और तनुजा स्टारर फिल्म ज्वैलथीफ लोगों को बेहद पसंद आई थी. आलम तो ये था कि इस फिल्म ने उस समय कुल मिलाकर 3 करोड़ 50 लाख रुपये का बिजनेस किया था, जोकि उस समय पर बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.

सिक्किम में फिल्म की शूटिंग

ज्वैलथीफ सिक्किम में शूट की गई थी. इस फिल्म में सिक्कम की हर खूबसूरत जगह को दिखाया गया. ये कहा जा सकता है कि जिसने सिक्किम न देखी हो, वह बस यह फिल्म भर देख ले तो मानों उसने सिक्किम घूम लिया हो. फिल्म ज्वैलथीफ में सिक्किम के लंबे-लंबे शॉर्ट्स दिखाए गए हैं. इस फिल्म की पूरी शूटिंग संपन्न हुई सिक्किम में. यह एक क्राइम थ्रिलर फिल्म थी.

शूटिंग से हुए इंस्पायर

‘होठों पे ऐसी बात’ गाना सिक्किम के गंगटोक के रॉयल पैलेस में फिल्माया गया था. सिक्किम की खूबसूरती को दुनिया के सामने लाने का श्रेय इस फिल्म को दिया जा सकता है. सिक्किम के एक नागरिक श्याम प्रधान (Shyam Pradhan) ने जब इस फिल्म की शूटिंग को देखा तो वह गंगटोक के एक स्कूल में टीचर थे. हिंदी सिनेमा के बड़े बड़े स्टार्स को आंखों के सामने देखना, मानों श्याम का सपना उनकी आंखों के सामने आ गया हो. इस फिल्म के जरिए उनका ये सपना पूरा हो गया. श्याम अपने दोस्तों के साथ स्कूल से भागकर फिल्म की शूटिंग को देखने पहुंच जाया करते थे.

देवानंद की एक्टिंग है बेमिसाल

श्याम प्रधान इस फिल्म के हीरो देवानंद कि एक्टिंग और फिल्म से इतने इंप्रेस हुए कि उनके मन में आया कि वह खुद भी एक फिल्म बनाएं. फिर क्या था, फिल्म की शूटिंग कंप्लीट होते है श्याम भी यूनिट के पीछे-पीछे मुंबई जा पहुंचे. वहां उन्होंने फिल्म बनाने के लिए प्लानिंग करनी शुरू कर दी. श्याम ने फिल्म की कहानी लिखी और सारी प्लानिंग के बाद श्याम अपनी पूरी यूनिट को लेकर पहुंच गए सिक्किम. उन्होंने फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी और सिक्किम की पहली हिंदी फिल्म बनी रोमियो इन सिक्कम.

फिल्म के एक गाने का सच

फिल्म ज्वैलथीफ से जुड़ी एक और रोचक बात आपको बताते हैं. ये गाना ‘यह दिल, ना होता बेचारा’ तो आपने कई बार सुना होगा. ये गाना पहले फिल्म कागज के फूल के लिए गुरुदास साहब के लिए लिखा गया था, लेकिन इस गाने का इस्तेमाल उस फिल्म में नहीं हो पाया. इसी बीच में आई फिल्म ज्वैलथीफ. इस फिल्म में फिर इस गाने को देवानंद पर फिल्माया गया.

लता मंगेश्कर और रफी में हुई अनबन

फिल्म ज्वैलथीफ के दिल पुकारे आ रे आ रे आ रे गाने को लता मंगेश्कर और मोहम्मद रफी ने अपनी सुरीली आवाज से सजाया. लेकिन इस गाने से चार साल पहले लता और रफी में झगड़ा हो गया था. दरअसल, फिल्म माया के गाने तस्वीर तेरी दिल में के वक्त दोनों सिंगर्स के बीच गायकों की रॉयल्टी को लेकर ऐसी बहस छिड़ी की दोनों का इतना बड़ा झगड़ा हो गया कि दोनों ने एक साथ ना काम करने की कमस खा ली. गुस्से में आकर रफी साहब ने लता से कहा कि वो अब उनके साथ गाना नहीं गाएंगे. लता ने कहा कि वह अब खुद भी कभी उनके साथ गाना नहीं गाना चाहती. उन दोनों का ये झगड़ा तकरीबन 4 साल तक चला.

लता और रफी हुए नाराज़

दोनों ने साथ में चार साल तक एक-दूसरे के साथ गाना नहीं गाया. फिल्म ज्वैलथीफ के गाने दिल पुकारे आ रे आ रे आ रे को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के चार साल पुराने झगड़े को सुलझाने का क्रेडिट देना गलत नहीं होगा. 1967 में संगीतकार जयकिशन के कहने पर रफी साहब ने लता से चिट्ठी लिखकर माफी मांगी. रफी की माफी के बाद ही दोनों ने साथ में फिल्म ज्वैलथीफ का ये झगड़ा खत्म हुआ और दोनों ने एकसाथ गाना गाया. इस फिल्म में देवानंद, अशोक कुमार, वैजयंती माला और तनुजा ने शानदार अभिनय किया है. यह एक जासूसी के इर्द-गिर्द घूमती फिल्म है. यह देव आनंद के होम प्रोडक्शन के बैनर तले बनी फिल्म थी. इस फिल्म को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ साउंड अवॉर्ड मिला. इस फिल्म के लिए तनुजा को बेस्ट स्पोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला. यह 1967 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों से एक थी.

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